एक बातचीत : अधिवक्ता ए० पी० सिंह से (निर्भया केस में दोषियों के अधिवक्ता का पक्ष)

निर्भया के गुनहगारों के वकील एपी सिंह बोले- मां का आदेश था तो केस से पीछे कैसे हटता
 दिल्ली में 16 दिसंबर 2012 को निर्भया गैंगरेप केस ने देशभर में लोगों के जेहन में आक्रोश पैदा कर दिया। इलाज के लिए पीड़िता को विदेश भेजा गया, जहां 29 दिसंबर को उसकी मौत हो गई। मोमबत्तियों, तख्तियों के साथ लोग सड़कों पर उतर आए। दोषियों राम सिंह, मुकेश, पवन, विनय, अक्षय के लिए फांसी की मां की जाने लगी। इनमें से राम सिंह ने तिहाड़ जेल में आत्महत्या कर ली थी। अब बचे चार लोगों की फांसी पर बार-बार तारीखें तय की जाती हैं, फिर आखिरी वक्त पर सजा को टाल दिया जाता है। सोमवार को तीसरी बार फांसी को अग्रिम आदेश तक के लिए टाल दिया गया। इसके साथ ही अक्षय, विनय और पवन के वकील एपी सिंह फिर चर्चा में आ गए।

एपी सिंह अपनी किताब दामिनी: अ पॉलिटिकल मर्डर का जिक्र करते हुए कहते हैं, 'मैंने पहले ही कह दिया था कि इस मामले में बहुत कुछ होगा। उस समय मैंने कहा था कि निर्भया को बचाना मुश्किल होगा क्योंकि लोग दोषियों के लिए फांसी की मांग कर रहे हैं...फिर निर्भया को मरना पड़ा। जिंदा रहते तो दोषियों को फांसी नहीं दी जा सकती, ऐसे में मार दिया जाता है।'

...तो क्यों पहुंचे थे डॉ. नरेश त्रेहन?

दोषियों के वकील एपी सिंह कहते हैं, 'निर्भया के इलाज के दौरान एम्स में मेदांता के डॉ. नरेश त्रेहन भी पहुंचे थे। हमने उन्हें और अन्य डॉक्टरों को आरोपियों की ओर से डिफेंस एविडेंस की लिस्ट के आधार पर सवाल-जवाब के लिए बुलाया था। हमने अन्य डॉक्टरों से पूछा कि क्या उन्होंने इलाज के डॉक्युमेंट्स देखे थे तो जवाब मिला, नहीं। फिर हमने पूछा कि क्या डॉ. त्रेहन पीड़िता से मिले तो कहा गया नहीं। हमने पूछा कि किसलिए आए थे तो बताया गया कि एयर ऐम्बुलेंस के अरेंजमेंट के लिए पहुंचे थे। हमने कहा कि क्या नरेश त्रेहन एयर ऐम्बुलेंस के ट्रैवल एजेंट का काम करते हैं।'

सवाल:

देशभर की निगाहें निर्भया मामले पर हैं, लोग दोषियों को फांसी चाहते हैं, कभी नहीं लगता कि शायद कहीं गलती हो रही है?

जवाब:

नहीं, मुझे ऐसा बिल्कुल नहीं लगता। जेल से दोषियों के परिवारों को किसी ने मेरा नंबर दिया था। अक्षय की पत्नी अपने दो महीने के बच्चे को लेकर मेरे पास आई थी। वह मेरी मां से मिली। मां ने मुझसे कहा था कि ये लोग कुछ बता रहे हैं, उसे भी सुनना चाहिए। मैंने कहा कि यह बवाली केस है, बहुत मीडिया ट्रायल है, पब्लिक सेंटिमेंट इन्वॉल्व हैं लेकिन उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं...मैं कह रही हूं तो इसे मन से लड़ो। उनका मानना है कि पूजा के 12 फूल हैं, जिनमें डरे हुए को अभयदान देना, भूखे को अन्न का दान, प्यासे को जल का दान, अनपढ़ को विद्या दान, वस्त्रहीन को वस्त्र दान देना चाहिए। इस तरह से कुल 12 हैं। अब मां का आदेश तो मानना हर हालत में है।

सवाल:

तीसरी बार फांसी टाल दी गई, क्यों आप इस आदेश के खिलाफ हैं?

जवाब:

कानूनी रूप से जो भी उपाय हैं, वे सभी दोषियों को मिलने चाहिए। मैंने जेसिका लाल मर्डर केस देखा, मैंने नैना साहनी तंदूर कांड भी देखा था। उसे क्षत-विक्षत करके तंदूर में डाला गया लेकिन दोषियों को फांसी नहीं हुई। निठारी कांड हुआ, कंकाल मिले, क्या दोषियों को फांसी दे दी गई। पुलवामा कांड पर तो कोई बात ही नहीं हुई। राजनीतिक तुष्टीकरण के आधार पर देश में फांसी की सजा तय होती है। इसी वजह से पूर्व चीफ जस्टिस ने कहा था कि फांसी का फंदा गरीबों के लिए बना है, अमीरों के लिए नहीं। यह डर महात्मा गांधी को पहले से था इसीलिए उन्होंने कहा था कि फांसी की सजा हिंसा है। यह सरकारों को बचाने के लिए, सरकारों को गिराने के लिए इस्तेमाल होगी।
सवाल:

निर्भया केस में जब दोष साबित हो चुका है, फिर भी उनका बचाव आपको क्यों सही लगता है?

जवाब:

दोषी साबित होने का सबसे पहला आधार टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (टीआईपी) होता है। टीआईपी में पहचान कराने के लिए मैजिस्ट्रेट के सामने पुलिस वाले ने शिनाख्त कराई, फिर इन्वेस्टिगेशन कैसी हुई, इन्वेस्टिगेशन के आधार पर दोष कैसे सिद्ध हो गया, ट्रायल कोर्ट की सजा कैसी हुई। टीआईपी के आधार पर ही चार्जशीट बनती है। दूसरी चीज निर्भया का एक दोस्त वर्ष 2013 में पैसे लेकर गवाही दे रहा था, डिबेट में बैठता था। इस बात का स्टिंग एक मीडिया बंधु के पास था। उन्होंने वर्ष 2019 में उसे लोगों के बीच रखा और कहा कि मैंने 2013 में यह इसलिए नहीं दिया कि वाहवाही तो होती, टीआरपी भी बढ़ती लेकिन दोषी और उसके वकीलों को इसका फायदा मिल जाता। क्या यह पारदर्शिता थी

सवाल:

आपके घर पर कौन-कौन हैं? क्या वे लोग इस मामले को लेकर आपसे नाराजगी नहीं जताते?

जवाब:

मेरे घर में मां, पत्नी, भाई, बच्चे सब हैं। वे लोग कहते हैं कि आंखों में काली पट्टी बांधकर आज भी कानून की देवी खड़ी है। जबतक यह पट्टी नहीं खुलेगी तबतक इस देश में गरीबों को न्याय नहीं मिल पाएगा। डिफेंस एविडेंस सामने आते हैं तो परिवारवाले सबकुछ देखते हैं।

सवाल:

क्या आपको नहीं लगता कि कानून के इतने दांवपेच अपराधियों का मनोबल बढ़ाते हैं?

जवाब:

मौते के मामले में फांसी है, क्या मर्डर बंद हो गए। दहेज की वजह से जला दिया जाता है, इस पर सख्त सजा है लेकिन क्या ऐसे मामले रुक गए। फांसी की बजाए उम्र कैद की सजा होन चाहिए। इन अपराधियों से देश के लिए प्रयोग किया जाए। इन्हें मानव बम बनाकर जहां भेजना हो भेज दिया जाए लेकिन फांसी गलत है। अपराधियों को कतई छोड़ा नहीं जाना चाहिए, इन्हें उम्र कैद देकर इनका इस्तेमाल कठिन कामों के लिए किया जाना चाहिए।

सवाल:

क्या आप कहते हैं कि इन दोषियों को फांसी नहीं होने देंगे?

जवाब:

मैं न तो ईश्वर हूं, न यमराज हूं। मेरा काम भारत का संविधान, सीआरपीसी, आईपीसी, राष्ट्रपति भवन की गरिमा बनाना है। मैं नहीं चाहता हूं कि कोई ऐसी गलती हो जाए कि इन पर धब्बा लग जाए। दरअसल, ये सभी चीजें पूज्यनीय हैं। आर्टिफिशल एविडेंस, फैब्रिकेटेड चार्जशीट, दबाव वाले ट्रायल के आधार पर किसी की जिंदगी न लें। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने कभी किसी को अपने कार्यकाल में फांसी नहीं दी।

सवाल:

आप मीडिया प्रेशर और पॉलिटिकल प्रेशर की बात करते हैं, सामाजिक दबाव भी उतना ही है...निर्भया के साथ क्या हुआ, यह जानते हुए भी आपको नींद आ जाती है?

जवाब:

मैं कामचोर नहीं हूं, मैं अपना पेशा पूरी ईमानदारी से निभा रहा हूं। मुझे नींद भी अच्छी आती है और भूख भी बहुत अच्छी लगती है। कुछ लोग मेरा सपॉर्ट करते हैं। वकील, न्यायिक अधिकारी सभी कहते हैं कि आपने कानून को पारदर्शी बनाने के लिए काम किया। मेरे काम की लोगों की ओर से सराहना की जाती है। हां, कुछ लोग सोशल मीडिया पर गालीगलौच भी करते हैं। यह उनके संस्कार हैं। कुछ लोग कैंपेन चलाते हैं। कहा जाता है कि मैं उनको जवाब दूं। मैंने अपने बच्चों को जॉनी-जॉनी, ट्विंकल-ट्विंकल नहीं पढ़ाया। मैंने उन्हें गार्गी, अपाला, सीता, सावित्री सिखाया है।

एक बातचीत : अधिवक्ता ए० पी० सिंह से (निर्भया केस में दोषियों के अधिवक्ता का पक्ष) एक बातचीत : अधिवक्ता ए० पी० सिंह से (निर्भया केस में दोषियों के अधिवक्ता का पक्ष) Reviewed by Creative Bihari on March 09, 2020 Rating: 5

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